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रामतीर्थ

                              रामतीर्थ

                मैं अनीश्वरवादी हूं, यह मेरा निजी मत है। मैं धर्मस्थलों की देहरी लांघकर उनके भीतर प्रवेश नहीं करता, यह भी मेरा व्यक्तिगत मामला है। किंतु अब जब अयोध्या में श्रीजन्मभूमि पर भव्य राम मंदिर का निर्माण होने जा रहा है, तो मैं देश के बहुसंख्य हिंदुओं के लिए प्रसन्न हूं, क्योंकि अब यह मेरा निजी मामला नहीं रह गया है। भारतदेश के धर्मप्राणजन के लिए श्रीराम क्या महत्व रखते हैं, इसकी प्रतीति मुझको भली प्रकार है। पहले के ज़माने में लोग मिलते थे तो राम-राम कहते थे। आज भी गांव-खेड़ों-टप्पों-तहसीलों में कहते ही हैं। जै श्री कृष्णा और जै श्री राम भारत के लोकाचार में गुंथ गए हैं। जय रामजी की में अभिवादन की सुगंध है। भारत में सदैव से ही राम से बड़ा राम का नाम कहलाया है। राम सियाराम सियाराम जै जै राम! रामधुन से लेकर रामनामी चादर तक राम के नाम की बड़ी महिमा है। गोस्वामीजी रामबोला कहलाते थे, वो राम का नाम लेकर जन्मे थे। महात्माजी राम का नाम लेकर मरे थे। किंतु भारतभूमि में ऐसे लोगों की कोई गणना ही नहीं है, जो राम का नाम लेकर जी रहे हैं। श्रीरामजन्मभूमि उनके लिए भूमि का एक संज्ञाहीन टुकड़ा भर नहीं है।

श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण भारत-देश के बहुसंख्यकों के लिए अस्मिता का एक बड़ा प्रश्न रहा है। यह अस्मिता सदियों से पद-दलित थी। मुझे नहीं मालूम समाजशास्त्रीय विवेचनों में सांस्कृतिक अस्मिता के महत्व पर कितना चिंतन किया गया है, किंतु अन्य भौतिक उपादानों की तरह यह भी जीवन के लिए एक अनिवार्य वस्तु है। अस्मिता की तुष्टि हो तो लोक-मानस में प्रशान्ति और प्रौढ़ता आती है। अस्मिता अवरुद्ध हो जाए तो विक्षोभ और नैराश्य सामूहिक अवचेतन को ग्रस लेता है। अयोध्या में श्रीराममंदिर का निर्माण भारत के बहुसंख्य हिंदुओं के लिए अपार हर्ष का अवसर है, यह उनकी अस्मिता के लिए प्राणदायी संजीवनी की तरह है। यह अकारण नहीं है कि महामारी के काल में भी आज भारत-भावना उत्सव की चेतना से आलोड़ित हो उठी है।

स्वतंत्रता के उपरान्त वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया था। भव्य मंदिर बनकर पूर्ण हुआ और भारत के राष्ट्रपति ने उसका लोकार्पण किया, उस अवसर पर बारडोली के सरदार अपनी नश्वर देह में उपस्थित नहीं हो सके थे, किंतु जाति-संस्कारों से निर्मित उनकी मनश्काया उस प्रसंग पर अवश्य उत्फुल्लित हुई होगी। जब अटल बिहारी वाजपेयी जनता-सरकार के विदेश मंत्री की हैसियत से अफ़गानिस्तान गए तो उन्होंने कहा, मैं गज़नी की यात्रा करना चाहता हूं। आश्चर्य जतलाया गया कि वो उस छोटे-से गांव में क्या देखना चाहते हैं, जहां कुछ भी नहीं है। अटल-प्रत्युत्तर था, क्योंकि बीते हज़ार सालों से यह नाम हमारी आत्मा में फांस की तरह चुभा हुआ है। विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल ने जब विजयनगर के विध्वंस के हवाले से भारत को एक ज़ख़्मी सभ्यता कहा था तो वो उसी दंश का हवाला दे रहे थे, जिसकी ओर अटल जी ने इंगित किया था। यह दंश भौतिक-काया में नहीं होता, एक राष्ट्रीय-चेतना में यह धंसा होता है, जिसकी अनुभूति उससे सम्पृक्ति रखने वाले व्यापक-जनसमूह में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आती है। श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर का निर्माण भी ऐसा ही एक अस्मिता का प्रश्न है, जिसकी परितुष्टि ईस्वी संवत् दो हज़ार बीस की पांचवीं अगस्त को हो रही है।

जिन्होंने सौगन्ध राम की खाई थी कि मंदिर वहीं बनाएंगे, उनके लिए तो यह मोक्ष है!

श्रीरामजन्मभूमि मामले में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इसमें समस्त वाद-संवाद और तर्क-वितर्क वर्ष 1990 तक पूर्ण हो चुके थे। उसमें कुछ नया जोड़ने की गुंजाइश नहीं रह गई थी। उन अकाट्य तथ्यों पर पृथक से लिख सकता हूं। इस प्रश्न के समाधान की राह में केवल मनोवैज्ञानिक बाधाएं शेष थीं, जिसे राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही पूर्ण किया जा सकता था। रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण मुख्यतया विश्व हिन्दू परिषद का एजेंडा था, जिस पर वह वर्ष 1966 से ही निरंतर काम कर रही थी। वर्ष 1989 में भारतीय जनता पार्टी ने इसे अपना चुनावी एजेंडा स्वीकारा। आज मेरी आंखों के सामने रथयात्रा, कारसेवा, बाबरी विध्वंस के दृश्य चलचित्र की तरह घूम रहे हैं। उन दिनों हवाओं में एक विद्युत-तरंग-सी दौड़ा करती थी। भारत में बहुसंख्य आबादी की अस्मिता के प्रश्नों का भी एक राजनीतिक महत्व है, प्रासंगिकता है, इस चेतना ने 1984 में दो सीटों वाली भारतीय जनता पार्टी को 1996 में केंद्र की सत्ता तक पहुंचाया था और आज वह दिल्ली में बहुमत की गद्दी पर आसीन है। यह एक ऐतिहासिक छल होता, अगर भाजपा के सत्ताकाल में हिंदुओं को उनके मन का यह उपहार नहीं मिल पाता। संतोष की बात है कि श्री नरेंद्र मोदी ने यह अवसर नहीं गंवाया। अटल, आडवाणी, मुरली मनोहर, अशोक सिंघल की श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन में केंद्रीय भूमिका तो सर्वज्ञात है, किंतु आज श्री नरेंद्र मोदी को राम स्वरूप, सीता राम गोयल, हर्ष नारायण, आभास कुमार चटर्जी, अरुण शौरी और कोएनराड एल्ष्ट जैसे बुद्धिजीवियों की अनुशंसा भी प्राप्त हो रही होगी, जिन्होंने अथक शोध, परिश्रम और निष्ठा से 90 के दशक में श्रीरामजन्मभूमि पर मंदिर-निर्माण की तार्किक पीठिका रचकर लोकमानस के सम्मुख प्रस्तुत की थी।

इसमें संदेह नहीं है कि भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं में एक लम्बे समय से आक्रोश की यह भावना रही है कि उनके साथ न्याय नहीं किया गया और वे अपने ही देश में छले गए। इसका मूल धार्मिक आधार पर हुए भारत-विभाजन में था। हिंदुओं का मत था कि भारत-विभाजन और पाकिस्तान-निर्माण के बाद भारतीय मुस्लिमों को कश्मीर और अयोध्या जैसे मसलों पर हठ का त्याग कर देना चाहिए था। कहना न होगा कि मुख्यधारा की बौद्धिकता ने इस आक्रोश के कारणों को समझने का उतना सदाशय प्रयास नहीं किया, जितना कि किया जाना चाहिए था। इसके परिणामस्वरूप ही हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति का उदय हुआ, जो केंद्र में लगातार दो बार बहुमत से चुनाव जीतकर अब यथास्थिति बन चुकी है। सोशल मीडिया पर व्यक्त होने वाला संघर्ष भी इसी का परिणाम है। किंतु तथ्य यही है कि जब 30 नवम्बर 1858 को बाबरी मस्जिद के मुअज़्ज़िन मुहम्मद असग़र ने फ़िरंगियों के नाम एक प्रार्थना पत्र लिखा था, तो इस जगह को "मस्जिद-ए-जन्मस्थान" कहकर सम्बोधित किया था। उसी जगह पर अब जब भव्य मंदिर बनने जा रहा है, तो प्रश्न यह नहीं है कि मंदिर क्यों बन रहा है, प्रश्न यह है कि अभी तक बना क्यों नहीं था।

गए साल पांचवीं अगस्त को कश्मीर से अनैतिक अलगाववादी धारा का उन्मूलन हुआ था। आज ठीक बारह महीने पश्चात अयोध्या में श्रीराममंदिर के निर्माण की पीठिका रची जा रही है। तीन में से दो वादे एक साल में पूरे किए जा चुके हैं। आशा है समान नागरिक संहिता से विभूषित रामराज्य के भी हम शीघ्र ही साक्षी होंगे। यह सच है कि अभी मथुरा-काशी बाक़ी है, पर आज के लिए इतना काफ़ी है।

भारत-देश के बहुसंख्य हिंदू धर्मावलम्बियों को रामतीर्थ की प्रतिष्ठा पर इस अनीश्वरवादी की ओर से भावभीनी शुभकामनाएं! #जय_श्रीराम

लेखक :- कमल जी 

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