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कर्म

 

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गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं- वास्तव में सभी कर्म प्रकर्ति के गुणों द्वारा किये हुए हैं
अज्ञानता से भरा हुआ अज्ञानी मनुष्य ये मैं कर रहा हूँ ऐसा मान लेता है।

कर्म का अर्थ है चलना या हरकत करना । कर्म पांच प्रकार के होते हैं -ऊपर फेकना ,नीचे गिराना ,सिकोड़ना,फैलाना एवं गमन करना। मनुष्य के कर्म पाप और पुण्य से युक्त होते हैं ।सभी प्रकार के कर्म रजोगुण के द्वारा किये जाते हैं,बिना रजोगुण के कोई क्रिया नही होती है। रजोगुण का जब सत्वगुण के साथ संबंध होता है तो ज्ञान धर्म वैराग्य में वृद्धि होती है । तथा रजोगुण का तमोगुण के साथ संबंध होने पर अज्ञान अधर्म अवैराग्य आदि कर्मो में प्रवृति होती है। यही दोनों प्रकार के कर्म शुभ-अशुभ,पाप-पुण्य कहलाते हैं ।
जब रजोगुण का सत्व और तम दोनों के साथ संबंध होता है तो मिश्रित कर्म कहे जाते हैं। इन्ही कर्मो के अनुसार चित्त में संस्कार पड़ते हैं तथा इनही को वासनाएं कहते हैं। जिनके चित्त में सिर्फ पुण्यमय कर्माशय हैं वे देवताओं के कुल में जन्म लेते हैं। जिनके चित्त में दोनों प्रकार के कर्मो के कर्माशय हैं वे मनुष्य योनि मे जन्म लेते हैं। तथा जिनके चित्त में पाप कर्माशय विद्दमान हैं वे नीच योनियां जैसे वृक्ष पशु पक्षी इत्यादि के रूप में जन्म लेते हैं 



 

सभी जीवात्माएं अपने कर्मो के अनुसार भोग करती हैं। जिनके चित्त में जैसे कर्माशय होते हैं उन्हें वैसी ही योनि में जाना पड़ता है ताकि वे अपने कर्माशयो के फल भोग सकें अर्थात सभी जीवात्माओं को अपने कर्मो के अनुकूल शरीर धारण करना पड़ता है। मनुष्य शरीर ही एक ऐसा शरीर है जो अपने पिछले जन्म के कर्माशयो को भोगता हुआ अपनी इच्छानुसार कर्म कर सकता है। मनुष्य के अलावा संसार मे जितने भी जीवधारी हैं चाहे वे सूक्ष्म शरीर धारी हो या फिर स्थूल शरीरधारी हो, वे अपनी इच्छानुसार कर्म नही कर सकते हैं ,बल्कि सिर्फ अपने पूर्वजन्मों में किये हुए कर्मो को भोग सकते हैं।मनुष्य से देवता श्रेष्ठ होते हैं क्योंकि उनके चित्त में पाप से रहित पुण्य कर्माशय होते हैं। इसलिए वे सदैव कर्मो का भोग किया करते हैं । इनके शरीर मे सत्वगुण की प्रधानता होती है। जब देवता अपने पुण्य कर्म भोग कर लेते हैं तो पुण्य कर्मों का भोग क्षीण हो जाने पर उन्हें वापस नए कर्म करने के लिए मृत्युलोक पर मनुष्य रूप में जन्म लेना पड़ता है ।
सभी प्रकार के शरीरधारियों में मनुष्य शरीर श्रेष्ठ माना गया है। मनुष्य शरीर के द्वारा योग का अभ्यास करके इस जन्म-मृत्यु के आवागमन से मुक्त हो सकता है तथा अपने वास्तविक रूप में स्थित हो सकता है जिसे वह अविद्या के कारण भूल चुका है।

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