भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में खाद्यान्नो की महत्ता को इस तथ्य से मापा जा सकता है की देश के समस्त बोये हुए क्षेत्र में से लगभग दो-तिहाई भाग पर खाद्यान्न फसलें उगाई जाती है। देश के सभी भागों में खाद्यान्न फसलें अति महत्वपूर्ण है फिर चाहे वह आजीविका निर्वाह अर्थव्यवस्था हो या व्यापारिक अर्थव्यवस्था।
खाद्यान्न संकट के कारण-
- कृषि की अनियमित मानसून पर निर्भरता खाद्यान्न के संकट का प्रमुख कारण है, क्योकि भारत की कुल कृषि का 1/3 क्षेत्र ही सिंचित क्षेत्र के अन्तर्गत आता है।
- कृषि योग्य भूमि के निम्नीकरण के प्रभाव से भी भारत को
खाद्यान्न संकट झेलना पड सकता है क्योंकि विशेषकर सिंचित क्षेत्रों में
मृदा में लवणता व क्षारियता की मात्रा दिनोंदिन बढ रही है जिससे मृदा मे
उर्वरता की मात्रा क्षीण होती जा रही है।
-बढती हूई आर्थिक
प्रतिस्पर्धा के दौर में किसानों का (विशेषकर बड़े किसान) ध्यान अधिकाधिक
लाभ अर्जन करने के लिए वाणिज्यिक फसलों की ओर हुआ है। इससे भी खाद्यान्न
फसलों के उत्पादन मे कमी देखने को मिल रही है।
- बढ़ती हुई जनसंख्या
एवं संयुक्त परिवारों के टूटने से भी जोतों का आकार दिनोंदिन छोटा होता जा
रहा है फलस्वरूप कृषि पर दबाव बढ रहा है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण
उचित जल प्रबंधन एवं जल उपयोग व्यवस्था विद्यमान नही होने के कारण देश में
भूजल स्तर तेजी से नीचे गिरता जा रहा है।
संकट को रोकने के उपाय
- जल प्रबंधन तकनीक को सुदृढ़ किया जाये। जैसे- वर्षा जल की उत्तम व्यवस्था, वाटर हार्वेस्टिंग पर जोर, बांध और सिंचाई नहरों का निर्माण।
- कृषि क्षेत्र मे नवाचार एवं उन्नत तकनीक का उपयोग।
- खाद्यान्न फसलों पर न्युनतम समर्थन मूल्य का एक उचित लाभ पर देने की सुनिश्चितता।
भारतीय कृषि को मजबूत आधार प्रदान करने के लिए सरकार कृषि क्षेत्र मे अधिक निवेश करने, राज्यों के बजट में कृषि को प्राथमिकता देने हेतु प्रोत्साहित करने, नवीन कृषि तकनीक के उपयोग को प्रेरित करने तथा कृषि उत्पादन में आने वाली समस्त बाधाओं का निवारण करने हेतु सतत् प्रयास कर रही है।
जय हिन्द ! जय भारत ! जय किसान !

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